शिव नगरी वाराणसी (Shiv Nagari Varanasi)

शिव नगरी वाराणसी (Shiv Nagari Varanasi)

शिव नगरी वाराणसी (Shiv Nagari Varanasi)

 वाराणसी घूमने की संपूर्ण जानकारी ( Places to visit in Varanasi )

  • दोस्तों हम अपने इस लेख में बनारस की महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल जैसे बनारस की घाट ,बनारस की गलियां, बनारस की मंदिर ,बनारस की प्रसिद्ध बाजार ,बनारस की प्रसिद्ध भोजन, बनारस की विश्वविद्यालय तथा बनारस की परिचय और बनारस की इतिहास का संक्षेप में वर्णन करेंगे जिससे कि जब आप बनारस बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने आए तो हमारी जानकारी की सहायता से आप आसानी से बनारस  घूम सकते हैं | 

  वाराणसी की परिचय ( Introduction of Varanasi ): 

  • दोस्तों  वाराणसी (Kashi Varanasi) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में पवित्र गंगा नदी के किनारे स्थित है | यह शहर हिंदुओं के लिए बहुत ही खास स्थलों में से एक है|  यहां पर कई सारे श्रद्धालु मुक्ति और शुद्धिकरण के लिए आते हैं, दोस्तों यहां पर आने वाले सभी  टूरिस्ट  अपने आप को बहुत ही हल्का महसूस करते हैं तथा यहां के तीर्थ स्थलों के दर्शन करके अपने आप को बहुत ही धन्य महसूस करते हैं |
  • दोस्तों वाराणसी के घाट, मंदिर ,गलियां  तथा अन्य पर्यटन स्थल भारतीय और विदेशी टूरिस्ट को बहुत ही आकर्षित करता है| यह नगर हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध एवं जैन धर्म में भी उसे पवित्र माना जाता है |
  • दोस्तों वाराणसी हिंदू धर्म के सबसे पवित्र शहरों में से एक हैं ,इस वाराणसी को लेकर हिंदू धर्म में एक बड़ी मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति यहां आकर मृत्यु को प्राप्त हो जाए या उसका अंतिम संस्कार काशी में किया जाए तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है| अर्थात उस व्यक्ति को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है इसलिए इस स्थान को मुक्ति स्थल भी कहा जाता है|इस नगरी के बारे में लोगों का अटूट विश्वास है कि यहां बहने वाले पवित्र गंगा नदी में यदि कोई डुबकी लगा ले  तो उसके सारे पाप धुल जाते हैं |यहां पर कई टूरिस्ट गंगा नदी में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय डुबकी लगाना  एक अनोखा और यादगार अनुभव रहता है |दोस्तों वाराणसी के मुख्य घाटों पर हर रोज शाम को आरती (प्रार्थना) का आयोजन किया जाता है| 
  • दोस्तों वाराणसी को भगवान शिव  निवास स्थान कहा जाता है इसीलिए यहां काशी विश्वनाथ का मंदिर स्थित है| जो भगवान शिव को समर्पित है काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा यहां एक नया विश्वनाथ मंदिर है जो वाराणसी के बीएचयू परिसर में बना हुआ है |
  • दोस्तों हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का  घराना यहीं वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है|  भारत के कई दार्शनिक लेखक , संगीतज्ञ, कवि  इसी नगरी में रहे हैं  जिसमें कबीर रविदास ,स्वामी रामानंद ,मुंशी प्रेमचंद्र,जयशंकर प्रसाद ,आचार्य रामचंद्र शुक्ला ,गिरिजा देवी ,पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ,बिस्मिल्लाह खान और भी  आदि कुछ हैं| परम पूजनीय गोस्वामी तुलसीदास जी ने हिंदू धर्म का “रामचरितमानस ग्रंथ” यही लिखा था और गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन इस काशी के निकट सारनाथ में दिया था|

वाराणसी की इतिहास (History of Varanasi in Hindi):

  • दोस्तों इस नगर  की उत्पत्ति उस समय  की है जब भगवान भोलेनाथ ने पार्वती से शादी की थी और इस  नगर को अपने   रहने की जगह चुना था। इसके बाद आर्यों ने इस नगरी में आकर  रहने लगे और यहां पर रेशम, मलमल, हाथी दांत और इत्र आदि  वस्तुओं का व्यापार शुरू कर दिया । आपको बता दें कि अफगान आक्रमण और मुस्लिम शासन  के समय इस  नगर को अपने विनाशकारी  दिन से गुजरना पड़ा था, उस समय बहुत सारे मंदिरों का विनाश हुआ था। लेकिन मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में इस  स्थान को अपना गौरव वापस मिला।काशी पवित्र सप्तपुरिया में से एक है |
  • दोस्तों महाभारत के दिनों में काशी भारत के समृद्ध जनपदों में से एक था| महाभारत में एक कथा लिखा गया है उसके अनुसार एक स्वयंवर में पांडव और कौरव के पितामह भीष्म ने काशी नरेश के तीन पुत्रियों का अपहरण किया था , इस अपहरण के  बाद काशी और हस्तिनापुर में शत्रुता हो गई | जिस कारण काशी नरेश महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से लड़ रहे थे |कई सालों बाद गंगा की बाढ़ से हस्तिनापुर डूब गया तब पांडव के वंशज वर्तमान इलाहाबाद जिले में यमुना किनारे कौशांबी में नई राजधानी बना कर बस गए ,उसका राज्य  वत्स कहलाया और काशी पर वत्स का अधिकार हो गया था|
  •  18 वीं शताब्दी में वाराणसी स्वतंत्र काशी राज्य बन गया था और बाद में ब्रिटिश शासन के अधीन मुख्य रूप से व्यापारिक और धार्मिक केंद्र रहा| ब्रिटिश प्रशासन ने वाराणसी को एक नया भारतीय राज्य बनाया और रामनगर को इसका मुख्यालय बनाया | काशी नरेश अब भी रामनगर किले में रहते हैं  यह किला वाराणसी के पूर्व में गंगा किनारे बना हुआ है| काशी नरेश राजा बलवंत सिंह ने  बलुआ पत्थर  से 18 वीं शताब्दी में करवाया था|यह किला मुगल स्थापत्य शैली में नक्काशीदार जो खुले प्रांगण और गुंबददार मंडप से सुसज्जित बना है| काशी नरेश का एक और महल है ,यह शिवाला घाट के नजदीक महाराजा चैत सिंह  ने बनवाया था 
  • दोस्तों रामनगर किला और इसका संग्रहालय बनारस के राजाओं की ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित हैं| आज भी काशी नरेश नगर के लोगों में सम्मानित हैं, यह नगर के धार्मिक अध्यक्ष माने जाते हैं  यहां के लोग इन्हें भगवान शिव का अवतार भी मानते हैं |काशी नरेश नगर के प्रमुख सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी बड़े धार्मिक गतिविधियों के अभिन्न अंग रहे हैं |
  • अलाउद्दीन खिलजी ने लगभग 1000 मंदिरों को नष्ट कर धराशाई कर दिया था| इस तोड़फोड़ में विश्वनाथ जी का मंदिर भी था, किंतु सन 1584 में सम्राट अकबर के राजस्व मंत्री की सहायता से विश्वनाथ जी का मंदिर  फिर से बनवाया | औरंगजेब ने काशी के प्राचीन मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनवाई जो आज ही है| यही नहीं उसने हजारों मंदिरों को नष्ट कर दिया जिसके कारण उस काल में 20 मंदिर भी गिन पाना बहुत मुश्किल हो गया था| 

वाराणसी की अर्थव्यवस्था (Economics of Varanasi):

  • दोस्तों भारतीय रेल की डीजल इंजन निर्माण हेतु डीजल इंजन कारखाना डीज़ल लोकोमोटिव वर्क्स (DLW)वाराणसी में स्थित है|
  • वाराणसी में विभिन्न प्रकार के कुटीर उद्योग है, जिसमें बनारस की रेशम साड़ी ,कपड़ा उद्योग, कालीन उद्योग एवं हस्तशिल्प प्रमुख हैं| दोस्तों बनारस का विश्व प्रसिद्ध बनारसी पान बहुत ही फेमस है इसके साथ यहां का कलाकंद भी बहुत मशहूर है| यहां की बनारसी रेशम साड़ियों पर बारीक डिजाइन और जरी का काम चार चांद लगाते हैं और साड़ी की शोभा बढ़ाते हैं इस कारण ही यह  साड़ियां वर्षों से सभी पारंपरिक उत्सव एवं विवाह आदि समारोह में पहनी जाती है | कुछ  समय पूर्व तक जरी में शुद्ध सोने का काम भी हुआ करता था|आप जब भी बनारस आए तो बनारस का पान खाना ना भूले और यहां की बनारसी साड़ियों को जरूर ले जाएं अपने साथ और उसका भी अनुभव ले |

दोस्तों वाराणसी में चार बड़े विश्वविद्यालय स्थित हैं|

  •  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University)

  •  महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ (Mahatama Gandhi Kashi Vidhayapeeth)

  • संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय (Sampuranand Sanskrit University)

  • सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ हायर तिब्बतियन स्टडी (Central institute of higher Tibetan studies)

गंगा नदी  (Ganga River) :

दोस्तों भारत की सबसे बड़ी नदी गंगा गोमुख से गंगासागर तक जाती है ,अपने इस पूरे रास्ते में गंगा नदी हमेशा उत्तर से दक्षिण की ओर  बहती हैं लेकिन केवल वाराणसी में गंगा नदी दक्षिण से उत्तर दिशा में बहती है |

रामनगर की रामलीला (Ram Leela in Ramnagar in Hindi): 

दोस्तों वाराणसी के नजदीक रामनगर है| यहां की रामलीला बहुत ही प्रसिद्ध है |यहां दशहरा का त्योहार खूब रौनक और तमाशा से भरा होता है| इस अवसर पर रेशमी और जरी  में सुसज्जित वेशभूषा में काशी नरेश की हाथी पर सवारी निकलती है और साथ में एक लंबा जुलूस होता है |यहां पर रामलीला पूरे एक महीना चलता है और उस रामलीला का उद्घाटन काशी नरेश करते हैं दशहरा के समय आप वाराणसी घूमने आते हैं तो रामनगर की रामलीला का आनंद जरूर उठाएं यह शाम से लेकर रात तक चलता है और रामनगर में ही होता है|

एक नहीं बल्कि 5 काशी है -

दोस्तों सनातन धर्म से संबंधित धार्मिक पुस्तकों में पंच काशी का उल्लेख मिलता है |इन पुस्तकों में कथाओं के अनुसार धरती पर एक नहीं बल्कि 5 काशी है इन पांच काशी को पंच काशी के नाम से संबोधित किया जाता है| आइए जानते हैं दोस्तों की 15 काशी कहां कहां पर स्थित है-

गुप्तकाशी :

गुप्तकाशी उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है यहां पहुंचने के लिए कुछ दूर की चढ़ाई पैदल करनी पड़ती है प्रकृति के सौंदर्य से लबरेज इस मार्ग में चढ़ाई कब पूरी हो जाती है पता नहीं चलता है यहां पर अगस्त मुनि का आश्रम है|

उत्तरा काशी:

दोस्तों उत्तराखंड राज्य में ऋषिकेश से करीब 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उत्तरकाशी जिला है| इस जिले की राजधानी और मुख्य शहर का नाम भी उत्तरकाशी ही है| यहां भगवान विश्वनाथ का मंदिर है इस मंदिर की स्थापना परशुराम जी द्वारा की गई थी| दोस्तों इस शहर में मंदिरों और तीर्थ स्थलों की बनावट बिल्कुल काशी की तरह बना हुआ है| यह उत्तर दिशा में होने के कारण इसका नाम उत्तरकाशी पड़ा| 

काशी :

काशी को वाराणसी और बनारस के नाम से भी जानते हैं| 

दक्षिण काशी :

दोस्तों यह मिर्जापुर जिले से करीब 70 किलोमीटर दूर अदवा नदी के तट पर स्थित है|यहां पर दक्षिण काशी मंदिर के अवशेष पुरातन काल में बने भव्य शिव मंदिर की गाथा गाते हैं| दोस्तों पुराणों में मिले वर्णन के अनुसार इस स्थान का इतिहास करीब 2000 साल पुराना है| प्राचीन काल में यह स्थान मुख्य काशी  अर्थात वाराणसी जाने के रास्ते का मुख्य पड़ाव था|

शिव काशी:

यह  भारत के तमिलनाडु राज्य के विरुधुनगर नगर में स्थित है| यह नगर भारत के पटाखा उद्योग की राजधानी है ,जहां लगभग 8000 छोटे बड़े कारखाने हैं जिनमें कुल मिलाकर 90% पटाखा  का उत्पादन किया जाता है| जवाहर लाल नेहरू ने इस शहर को मिनी जापान का नाम दिया था|

वाराणसी के पर्यटक स्थल ( Tourist place in Varanasi in Hindi ):

दोस्तों वाराणसी के पर्यटक स्थल में वाराणसी की घाट ,मंदिर, बाजार, गंगा आरती, अन्य सभी बहुत सारे हैं हम आपको महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल स्थल का वर्णन संक्षेप में  कर रहे हैं |

वाराणसी के घाट (Ghat in Varanasi in Hindi) :

  •  दोस्तों वाराणसी में छोटे बड़े सभी घाट मिलाकर लगभग 84 घाट हैं |इसमें से अधिकांश घाट  नहाने और पूजा समारोह के लिए  उपयोग किया जाता है, जबकि 2 घाटों को विशेष रूप से  दाह संस्कार( मुर्दा जलाने) के रूप में उपयोग किया जाता है|  इनमें  से अधिकांश घाटों का पुनर्निर्माण किया गया था जब यह शहर मराठा साम्राज्य का हिस्सा था| 

  • दोस्तों हम यहां पर कुछ महत्वपूर्ण घाटों के बारे में आपको बता रहे हैं ,जहां आप वाराणसी घूमने के दौरान आप वहां पर आसानी से जा सकते हैं और घाट का आनंद उठा सकते हैं |दोस्तों कोई  घाट हो वहां पर सुबह और शाम के समय नाव की सवारी करना एक अद्भुत आनंद की अनुभूति करता है | वाराणसी के घाट समृद्ध और संस्कृति  तथा इतिहास का प्रतीक है|

1. दशाश्वमेध घाट (Dashashwamedh Ghat in Varanasi):

  • दोस्तों  यह  घाट काशी विश्वनाथ मंदिर के निकट स्थित है और एक सबसे शानदार घाट है|यहां पर प्रत्येक शाम को पुजारियों का एक समूह यहां अग्नि पूजा करता है जिसमें भगवान शिव, गंगा नदी, सूर्य देव, अग्निदेव एवं संपूर्ण ब्रह्मांड को आहुतियां दी जाती हैं  यहां मां गंगा का शाम को  रोज भव्य आरती होता है| 

  • दशाश्वमेध घाट सबसे पुराने और सबसे महत्वपूर्ण घाटों में एक है| दोस्तों इस घाट को लेकर दो हिंदू पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, पहला की इस घाट का निर्माण ब्रह्मा जी ने भगवान शिव के स्वागत के लिए बनवाया था दूसरी  कथा है यहां पर दस  अश्वमेध यज्ञ (10घोड़ों की बलि) किये थे|

  • दोस्तों शाम को इस घाट पर आयोजित गंगा आरती सबको मोहित कर देती है |सभी भक्तगण मां गंगा की भक्ति में लीन हो जाते हैं यहां पर प्रतिदिन लगभग हजारों की संख्या में भीड़ होती है|

2.अस्सीघाट(Assi-Ghat InVaranasi):

  • दोस्तों अस्सी घाट, अस्सी नदी और गंगा नदी के संगम पर स्थित है, इसलिए  इस घाट का नाम अस्सी घाट पड़ा | यह गंगा के बाएं तट पर उत्तर से दक्षिण फैली घाटों की श्रृंखला में सबसे दक्षिण और अंतिम घाट है |दक्षिण की तरफ से यह पहला घाट है, जहां से गंगा वाराणसी में प्रवेश करती हैं | अतः यह घाट घाट सभी घाटों में शुद्ध है ,यहां गंगा का स्वरूप भी साफ सुथरा तथा प्रदूषण रहित है|
  •  दोस्तों एक पौराणिक कथा के अनुसार कहा जाता है  दे कि दे देवी दुर्गा ने राक्षस शुम्‍भा - निशुम्‍भा  का वध करने के बाद दुर्गा माता ने दुर्गाकुंड के तट पर विश्राम किया था और यहीं पर अपनी तलवार छोड़ दी थी ,जिसके गिरने से अस्सी नदी उत्पन्न हो गई वहां से  अस्सी नदी का क्षेत्र शुरू हो जाता है|
  •  इस घाट का वर्णन कई हिंदू धार्मिक ग्रंथों और पुराणों जैसे -मत्स्य पुराण ,अग्नि पुराण ,काशी कांड और पद्म पुराण आदि से मिलता है| इस घाट पर एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थित है| जहां तीर्थयात्री गंगा नदी में पवित्र स्नान करने के बाद पूजा अर्चना करते हैं |यह घाट सांस्कृतिक एवं धार्मिक तथा मस्ती के स्वरूप में वाराणसी का केंद्र है| इस घाट पर भीड़ सबसे ज्यादा होती है यहां सुबह 4:00 बजे से इस घाट पर आना जाना लगा रहता है |सभी मांगलिक कार्य किसी घाट पर किए जाते हैं| 

3. मणिकर्णिका घाट (Manikarnika Ghat Varanasi):

  • दोस्तों गंगा के तट पर मणिकर्णिका घाट भारत का एकमात्र ऐसा घाट है जहां दिन रात 24 घंटा शव को दाह संस्कार किया जाता है| एक पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती जी का कर्णफूल यहां एक कुंड में गिर गया था, जिसे ढूंढने का काम भगवान शंकर जी द्वारा किया गया जिस कारण इस स्थान का नाम मणिकर्णिका पड़ गया | एक और दूसरी मान्यता के अनुसार भगवान शंकर जी द्वारा माता पार्वती जी के पार्थिव शरीर का दाह संस्कार यही किया गया, जिस कारण इसे महाश्मसान समसान भी कहते हैं|यहां लोग देश विदेश से इस घाट का दर्शन करने के लिए आते हैं| घाट पर आने के बाद दोस्तों यह साफ होता है कि जीवन का यह अंतिम सत्य है और आपका हृदय बहुत ही करुणा से भर जाएगा आपको एहसास होगा कि जीवन में किसी भी इंसान के साथ गलत ना करो  क्यों की एक दिन हमें भी यहीं पर आना  है| सच में आपको जब भी मौका मिले अब जरूर इस मणिकर्णिका घाट पर एक बार यहां का दर्शन करने जरूर जाइए|
  • दोस्तों यहां  पर्यटकों को हिन्दू धर्म के दाह संस्कार देखने ओर यहां के रीति रिवाज जानने का मौका भी मिलता है। यहा बहुत ही सुन्दर गणेश मंदिर भी हम देख सकते है, इस घाट के पास में बना हुआ है। यहां संपन्न, धनवान ओर किसी विशेष व्यक्ति का अंतिम संस्कार यही किया जाता है।यहाँ  मुर्दा को भी अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता है, दिन में करीब  250-300 दाह संस्कार के लिए आते हैं और जितने  मुर्दा जल रहे होते हैं, उससे ज्यादा  मुर्दा दाह संस्कार की कतार में रहते है| 
  • दोस्तों यहां पर मुर्दा को आग देने का काम  डोम राजा करते हैं |उनका काम है दाह संस्कार का टैक्स वसूलना| बिना डोम राजा के किसी भी चिता को अग्नि नहीं दी जाती है| मुर्दा को अग्नि देने से पहले यहां की परंपरा है ,मुर्दा को गंगा में स्नान कराने की |मणिकर्णिका घाट पर मुर्दा को उसकी अर्थी समेत गंगा में डुबकी लगवा दी जाती है, इसके बाद इन्हें दाह संस्कार की प्रतीक्षा सूची में  रखा जाता है|

4. हरिश्चन्द्र घाट (Harishchandra Ghat Varanasi):

  • दोस्तों वाराणसी में मृतकों के  दाह संस्कार के लिए 2 घाट बहुत ही प्रसिद्ध है, पहला मणिकर्णिका घाट है और दूसरा  राजा हरिश्चंद्र घाट हैं| यह घाट मैसूर घाट एवं गंगा घाटों के बीच में स्थित है। इस घाट पर  दाह संस्कार दिन-रात किए जाते हैं| इस  घाट के समीप में काशी नरेश ने एक भवन " डोम राजा " के निवास हेतु दान किया  था। यह परिवार स्वयं को पौराणिक काल में वर्णित "कालू डोम " का वंशज मानता है।
  • इस घाट पर राजा  हरिश्चंद्र माता तारामती एवं रोहताश्व का बहुत पुरातन मंदिर है साथ में एक शिव मंदिर भी है। आधुनिकता के युग में यहाँ एक विद्युत शवदाह भी है,परन्तु इसका प्रयोग कम ही लोग करते हैं।
  • दोस्तों इस घाट का इतिहास राजा हरिश्चंद्र से जुड़ा है|आपने टीवी में राजा हरिश्चंद्र का सीरियल भी देखा होगा ,अगर आपने नहीं देखा है तो आप देखिएगा इतिहास उन्हीं से ही जुड़ा हुआ है | राजा हरिश्चंद्र  अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी  राजा थे जो सत्यव्रत के पुत्र थे। ये अपनी सत्यनिष्ठा के लिए अद्वितीय थे और इसके लिए इन्हें अनेक कष्ट सहने पड़े| राजा हरिश्चंद्र के बेटे की सर्प काटने से मृत्यु के बाद उन्हें अपने पुत्र के दाह संस्कार के लिए डोम राजा  से आज्ञा मांगी थी| जिसके यहां पर उन्होंने  एक राजा होते हुए भी एक वचन के अनुसार नौकरी की थी| उस समय बिना दान के दाह संस्कार करना मान्य नहीं था, इसलिए राजा हरिश्चंद्र जी ने अपनी पत्नी की साड़ी का एक टुकड़ा दान में दे कर अपने पुत्र का दाह संस्कार किया तभी से यह हजारों साल से परंपरा चली आ रही है| 

वाराणसी के मंदिर (Temple in Varanasi):

  • दोस्तों वैसे वाराणसी में बहुत सारे मंदिर हैं आपको हर एक सड़क और गली में एक मंदिर जरूर मिल जाएगा और यहां पर कुछ ऐसे मंदिर है जिनका ऐतिहासिक और बनावट के लिहाज से बहुत ही खास महत्व है| हम अपने इस लेख में कुछ महत्वपूर्ण मंदिरों का एक-एक करके वर्णन करेंगे दोस्तों आप जब भी वाराणसी आइए तो इन मंदिरों में आप जरूर जाइए आपके मन को बहुत ही शांति मिलेगा| 

 1. काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple Varanasi):

  •  दोस्तों काशी विश्वनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है|यह शायद इकलौता ऐसा मंदिर है जो अत्याचारी मुगल शासक औरंगजेब द्वारा नष्ट किए जाने के बाद भी बचा रहा।अगर आप वाराणसी की यात्रा करने जा रहे हैं तो काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करे बिना आपकी यात्रा अधूरी रह जाती है। काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक हैं जो भोलेनाथ  को समर्पित है।  ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र  गंगा नदी  में स्‍नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. नया विश्वनाथ मंदिर बीएचयू में (New Vishwanath Temple Varanasi) :

  • दोस्तों नये विश्‍वनाथ मंदिर की स्‍थापना पंडित मदन मोहन मालवीय ने की थी,  यह मंदिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में बना हुआ है| पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने ही बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय  की स्थापना किया था। यह मंदिर भगवान  भोलेनाथ को समर्पित है। इस मंदिर  को बनाने की शुरुआत 1931 में  की गई थी और इसे पूरा होने में लगभग तीन दशक लग गए थे।
  • नया विश्वनाथ मंदिर सफेद संगमरमर से बना हुआ है जो सेम टू सेम असली विश्‍वनाथ मंदिर की कॉपी है। असली विश्‍वनाथ मंदिर भी काशी में ही स्थित है| 

3. संकट मोचन हनुमान मंदिर (Sankat Mochan Hanuman Temple Varanasi):

  • दोस्तों संकट मोचन हनुमान मंदिर पवित्र मंदिरों में से एक है|संकटमोचन का अर्थ होता है दुखों और परेशानी को हरने वाला| इस मंदिर की स्थापना मदन मोहन मालवीय जी द्वारा 1900 ई.वि. में किया गया था|  यहां हनुमान जयंती बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है और इस दौरान एक शोभायात्रा भी निकाली जाती है| यहां हनुमान जी को प्रसाद के रूप में शुद्ध देसी घी के बेसन के लड्डू चढ़ाए जाते हैं|  इस मंदिर को वानर के मंदिर से भी नाम जाना जाता है इस मंदिर के आस पास बहुत सारे बंदर है|ऐसा लगता है कि हनुमान जी अपने वानर सेना के साथ इस मंदिर में निवास किए हैं|
  •  ऐसा कहा जाता है  की इस मंदिर की स्थापना वही हुईं हैं जहाँ महाकवि तुलसीदास को पहली बार हनुमान का स्वप्न आया था|  हर मंगलवार और शनिवार को हजारों की संख्या  में लोग भगवान हनुमान को पूजा अर्चना अर्पित करने के लिए  लाइन में खड़े रहते हैं। ज्योतिष के अनुसार भगवान हनुमान मनुष्यों को शनि ग्रह के क्रोध से बचते हैं अथवा जिन लोगों की कुंडलियो में शनि गलत स्थान पर स्तिथ होता हैं, वे विशेष रूप से ज्योतिषीय उपचार के लिए इस मंदिर में आते हैं। 

4. दुर्गा मंदिर (Durga Mandir Varanasi):

  • इस मंदिर का निर्माण एक बंगाली महारानी ने 18 वीं सदी में करवाया था। इस समय में यह मंदिर बनारस के शाही परिवार के नियंत्रण में आता है।लाल पत्थरों से बने अति भव्य इस मंदिर के एक तरफ "दुर्गा कुंड" है। इस कुंड को बाद में नगर पालिका ने फुहारे में बदल दिया, जो अपनी मूल सुन्दरता को खो चुका है। इस मंदिर में माँ दुर्गा "यंत्र" रूप में विरजमान है। इस मंदिर में बाबा भैरोनाथ, लक्ष्मीजी, सरस्वती जी, एवं माता काली की मूर्ति  अलग से  है। यहाँ मांगलिक कार्य मुंडन इत्यादि में माँ के दर्शन के लिये आते है।नवरात्रि, सावन तथा मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में भक्‍तों की काफी भीड़ रहती है|मंदिर के अंदर हवन कुंड है, जहाँ रोज हवन होते हैं। कुछ लोग यहाँ तंत्र पूजा भी करते हैं। सावन महिने में बहुत मनमोहक मेला लगता है।

5. तुलसी मानस मंदिर (Thulasi Mandir Varanasi):

  • दोस्तों तुलसी मानसा मंदिर वाराणसी के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है। इस मंदिर को 1964 में बनाया गया था यह मंदिर भगवान राम को समर्पित है।  आपको बता दें कि इस मंदिर का नाम तुलसीदास जी के नाम पर पर रखा गया है। मंदिर में सावन के महीनों  में कठपुतलियों का एक विशेष प्रदर्शन होता है जो रामायण से संबंधित है। अगर आप एक मजेदार अनुभव का आनंद लेना चाहते हैं, तो सावन के महीनों में यहां की यात्रा करें।
  • यह मन्दिर वाराणसी कैन्ट (रेलवे स्टेशन) से लगभग पाँच 5 किलोमीटर की दूरी पर दुर्गा मन्दिर के नजदीक में है|इस मन्दिर को सेठ रतन लाल सुरेका ने बनवाया था।मंदिर पूरी तरह से संगमरमर का बना हुआ है इसका उद्घाटन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम सर्वपल्ली राधाकृष्णन  द्वारा सन॒ 1964 में किया गया। 
  • दोस्तों इस मन्दिर के  बीच  मे  भगवान राम,  लक्ष्मण, माता जानकीएवं  हनुमान जी  की  मूर्ति है । इनके एक तरफ माता  अन्नपूर्णा एवं  भोलेनाथ तथा दूसरी तरफ सत्यनारायणजी का मन्दिर है। इस मन्दिर के सम्पूर्ण दीवार पर  रामचरितमानस लिखा गया है। दीवारों पर रामायण के प्रसिद्ध चित्रण को बहुत सुन्दर ढंग से नक्कासी किया गया है । 

रामनगर का किला (Ramnagar Fort Varanasi):

  • दोस्तों रामनगर का किला वाराणसी के रामनगर में स्थित है। यह  गंगा नदी के पूर्वी तट पर तुलसी घाट के सामने स्थित है। इसका निर्माण 1750 में काशी नरेश बलवन्त सिंह ने कराया था। किले में 4 फाटक हैं जिसमें पूर्वी दिशा में बना लाल दरवाजा दुर्ग का मुख्य द्वार है इस किले में दो बड़े आंगन है जिसमें पहला लाल दरवाजे के बाद तथा दूसरा झंडा द्वार के बाद जिसमें रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला का कोर्ट विदाई का  मंचन किया जाता है |
  • दोस्तों राम नगर दुर्ग में काशी के विज्ञान तथा काला के अद्भुत ज्ञान संगम का प्रतीक धर्म घड़ी जो किले के अंदर दूसरे तल पर स्थापित है| इसे रामनगर के कारीगर मूलचंद शर्मा ने वर्ष 1872 में बनाया था| यह घड़ी आधुनिक समय, दिन तथा तारीख को बताता है| भारतीय ज्योतिष शास्त्र पर आधारित घटनाओं को भी व्यक्त करता है इस घड़ी  में नक्षत्र ,ग्रह राशि, सूर्योदय ,सूर्यास्त के साथ ही घड़ी घंटा पल  जैसे भारतीय समय मानकों का भी प्रदर्शन होता है |एक बार सन् 1920 में कुछ क्यों खराबियों की मरम्मत करनी पड़ी थी जो मूलचंद्र के पुत्र बाबू मुन्नी लाल शर्मा ने किया था |वर्तमान में इस धर्म घड़ी को देखरेख आदि का कार्य शर्मा परिवार के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी किया जाता है |
  • दोस्तों 18 वीं शताब्दी के बाद से यह काशी नरेश का घर रहा है और वर्तमान में महाराजा अनंत नारायण सिंह किले में निवास कर रहे हैं।रामनगर किले में एक मंदिर और मैदान के भीतर एक संग्रहालय है|यह मंदिर वेद व्यास को समर्पित है, जिन्होंने महान भारतीय महाकाव्य महाभारत रचना किया था। 

वाराणसी के प्रसिद्ध भोजन:

  • दोस्तों बनारस, जिस शहर के नाम में ही रस हो उस शहर के व्यंजनों में कितना स्वाद होगा। अध्यात्म व संस्कृतियों वाला शहर इतिहास के साथ-साथ लजीज व्यंजनों को भी समेटे हुए है।काशी आने के बाद अगर आपने इन चीजों को नहीं चखा तो समझिए बनारस ही नहीं घूमा। एक बार इन लजीज पकवानों को खाने के बाद आप बार-बार इन्हें खाने के लिए शिव की नगरी जरूर आएंगे। हम आपको बताने जा रहे हैं, कुछ ऐसे ही फेमस फूड आइटम्स के बारे में|  

1. काशी की सुबह का नाश्ता पूरी सब्जी और जलेबी :-

दोस्तों जब दुनिया  के लोग घरों  में ब्रेड टीका इंतजार कर  होते हैं तो यहां काशी में सुबह 6 बजे ही गर्मा गरम पूरी सब्जी और जलेबी का नाश्ता करके फिट हो जाते हैं। बनारस में सुबह-सुबह कचौड़ी-सब्जी खाने का मजा ही कुछ और है और जलेबी के साथ खाने से इसका स्वाद दोगुना बढ़ जाता है। लंका में स्थित 'चाची की दुकान' कचौड़ी-जलेबी के लिए मशहूर है।

2. कचौड़ी गली :

दोस्तों जगह-जगह पर बड़ी-बड़ी  कड़ाहियों में खौलता तेल, घाट के नजदीक वारणसी की कचौड़ी गली एक लैंडमार्क बन गया है।  विश्वनाथ मंदिर को पार करते ही विश्वनाथ गली, कचौड़ी  गली में बदल जाती है। यह वो जगह है जहां ताजा कचौड़ी चने और इमली की चटनी के साथ परोसी जाती है। यदि आप भीड़ से बचना चाहते हैं और ताज़ा गर्मा-गर्म कचौड़ियों का स्वाद लेना चाहते हैं तो आपको सुबह सात बजे ही यहां पहुंचना पड़ेगा क्योंकि नाश्ते का समय खत्म होने के बाद यहां सन्नाटा पसर जाता है।

3. बनारसी पान (Banarasi Paan):

दोस्तों बनारस का पान इतना ज्यादा फेमस है कि इस पर हिंदी गाना भी बन चुका है। ‘खाई के पान बनारस वाला खुल जाए बंद अकल का ताला’ |यहां आपको पान की कई वैरायटी मिलेगी। 'गुलकंद' से लेकर 'कत्थे' वाला स्पेशल पान यहां की पहचान है।

4. ठंडाई या लस्सी: 

 दोस्तों वाराणसी का सबसे लोकप्रिय चीजों में शामिल है यहां की ठंडाई या लस्सी। यहां स्ट्रॉबेरी, आम, चॉकलेट जैसे कई लस्सी के फ्लेवर है , लेकिन मूल स्वाद के लिए साधारण लस्सी को ही चुने । सबसे जरूरी बात यह है कि भांग यहां वैध है और आप यहाँ भांग लस्सी का भी मजा ले सकते है | फ्लेवर के आधार पर प्रत्येक ग्लास की कीमत 50 से 150 रूपये तक होती है |अपने सुविधानुसार कोई सा भी  ग्लास ले सकते हैं|

5. लवंग लता:

ये बनारस की ऐसी डिश है, जो लगभग सभी दुकान पर मिलती है। मैदे को गूंथकर उसे रोटी की तरह बेल लेते हैं। फिर इसमें खोया और लौंग डालकर फोल्ड करके घी में डीप फ्राई करते हैं, उसके बाद चासनी में डुबो देते हैं |एक बार जो लौंगलता खा लेता है, वो इसका दीवाना हो जाता है।बहुत पसंद है लॉन्ग लता  हमें| 

6. ओस की बूंद से बनी बनारसी मलइयो : 

दोस्तों जहाँ बाकी की बनारसी मिठाइयां समय के साथ-साथ भारत में दूसरी जगह भी बनाए जाने लगी हैं|वहीं बनारसी मलइयो एक मात्र ऐसी मिठाई है जिस पर आज भी बनारस का एकाधिकार है।इसे बनाने की बेहद खास विधि है| दूध को चीनी के साथ उबालकर आसमान के  नीचे ओस   में रख दिया जाता है रात भर ओस  में रखने के बाद इसमें दूध मिलाया जाता है, इसके बाद किसी बर्तन में दूध को काफी देर तक  मिलाया जाता है  तब इसमें झांक तैयार होता है जिससे लाजवाब मलाई  कहते हैं|  क्योंकि यहओस के द्वारा बनाई जाती है इसलिए इसे ज्यादातर सर्दियों में तैयार किया जाता है|

7.  कुल्हड़ वाली चाय:

दोस्तों बनारस में कुल्हड़  में चाय पीने का एक अपना अलग ही मजा है जहां मिटटी की सोंधी सोंधी खुशबू वालेकुल्हड़ में चाय पीने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं वैसे तो चाय पीने के लिए दुकानों पर हमेशा भीड़ लगी रहती है लेकिन सर्दियों में लोग वहां पर ही डेरा जमा लेते हैं| 

वाराणसी के फेमस बाजार (Famous market in Varanasi):

  • दोस्तों वाराणसी में वैसे कई सारे बाजार हैं लेकिन यहां की दालमंडी , गोदौलिया मार्केट बहुत ही अच्छा है|

 वाराणसी कैसे पहुंचे(How to reach Varanasi In Hindi):

  • दोस्तों वाराणसी  से बड़े शहर जैसे की नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पुणे, अहमदाबाद, इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन और जयपुर आदि से वायु, सड़क और रेल यातायात जुड़ा हुआ है।

 वायु मार्ग से कैसे पहुंचे (How to reach Varanasi by flight) :

वाराणसी Varanasi Airport में  लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है जो भारत के अन्य शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।, यहां से दिल्ली, लखनऊ ,मुंबई के लिए  रोज की फ्लाइट है|यहां पर स्पाइस जेट, एयर इंडिया, इंडिगो, विस्तारा और जेट एयरवेज की सीधी उड़ान है।एयरपोर्ट से वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन की डिस्टेंस लगभग 22 किलोमीटर है| 

 ट्रेन से कैसे पहुंचे (How to reach Varanasi by Train):

  • दोस्तों देश की अधिकांश मुख्य ट्रेन यहां से गुजरती हैं। इनमें राजधानी एक्सप्रेस, दुरंतो एक्सप्रेस, महानगरी एक्सप्रेस, शिव गंगा जैसी सुपरफास्ट ट्रेन शामिल हैं। इसके अलावा वाराणसी से 17 किलोमीटर दूर मुगलसराय(पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन) रेलवे स्टेशन है। यहां से उत्तर भारत की अधिकांश ट्रेनें गुजरती हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन भारत का चौथा सबसे व्यस्त रेलवे जंक्शन है।

 सड़क मार्ग से कैसे पहुंचे (How to reach Varanasi by road):

  • दोस्तों वाराणसी पहुंचने के लिए आप सड़क मार्ग से कहीं भी हो बनारस हर जगह से जुड़ा हुआ है| गोरखपुर ,इलाहाबाद ,कानपुर, मथुरा, अयोध्या, दिल्ली, लखनऊ, पटना ,भोपाल सभी बड़े शहर से वाराणसी सड़क मार्ग से जुड़ा है एसी और नॉन एसी बस सभी मिलती हैं यहां आने के लिए|

 वाराणसी की मैप (Varanasi map):